नवोत्पल

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मै हमेशा सोचता हूँ कि ब्लॉग से लोगों की डायरियों के भीतर रचा जा रहा साहित्य बाहर निकला है. साहित्य यदि समाज का दर्पण है तो इसे रचने-गढ़ने और पढ़ने में समाज का हर व्यक्ति शामिल होना चाहिये. ब्लाग के माध्यम से यह संभव हो सका है. अब कोई स्थापना टिप्पणियों से निर्भय नहीं रह सकती. इसप्रकार लेखन का एक प्रकार का लोकतंत्रीकरण संभव हुआ है. इस स्पेस का लाभ उठाते हुए इस ब्लॉग की प्रस्तावना है. इस ब्लॉग में नवोदित कवियों की रचनाएँ होंगी, समय-समय पर साहित्यिक चर्चाएँ होंगी, सामाजिक मुद्दों पर सहज विमर्श बनेंगे, राजनीति के ऊंच-नीच पर बात होगी।
 
नवोत्पल के अंतर्जालिक संस्करण की मूलभूत प्रेरणा के दो महत्वपूर्ण आयाम हैं: पहले तो 'सहजता ' और दूसरे 'सरोकार ' !
बोध का स्तर ज्ञान की विशिष्टता को सहज रूप में संप्रेषित कर पाने की क्षमता से निर्धारित होना ही चाहिए।
 
सहजता, आयामों और शैलियों से इतर तथ्य पर मन जमाये रहती है। तथ्य ऑब्जेक्टिव और सब्जेक्टिव दोनों ही सामान महत्त्व के हैं। नवोत्पल 'सहजता ' के लक्ष्य के वशीभूत हो अपने उपक्रम को अन्यान्य विचारों का समावेशी मंच बना सके, यही शुभाशा है। दूजे इस शुभाशा में सरोकार भी सधें यही अपेक्षा है। इसमें हम मिलकर ही आगे बढ़ सके सकते हैं।
 
भाषा, सेतु है; लेखक और पाठक का सम्बन्ध इंटरचेंजेबल व पारस्परिक बना रहे।